नारायण कवच
Narayan Kawach
जो नारायण कवच धारण करता है, ऐसा आदमी अगर किसी को छु दे तो उसका भी मंगल होता है | नारायण कवच
की ऐसी बड़ी भारी महिमा है | श्रीमदभागवत में नारायण कवच लम्बी चौड़ी विधि से भी किया जा सकता है और आज
कल वो विधि करने की क्षमता न हो तो ऐसे ही भावना से भी किया जा सकता है | मेरे अंग प्रति अंग में भगवान
नारायण का निवास है, मेरे मन और बुद्धि की भगवान नारायण रक्षा करें, मुझे पाप कर्म में गिरने से नारायण
बचाये, मुझे अशांति और दुखों से नारायण बचाये | नर और नारी में बसे हुए हम नारायण चैतन्य आत्मा का आवाहन
करते, प्रागट्य चाहते है |
श्रीमदभागवत में इन्द्र जब प्रभाव हीन हो जाता है गुरु का अनादर करने से, दैत्य ने इन्द्र पर धावा बोल दिया और
देवता लोग दर दर की ठोकरे खाने लगे, इन्द्र प्रभाव हीन होकर भटकने लगा और भगवान ब्रह्माजी की स्तुति करने को
पंहुचा | कथा ऐसी आती है की एक बार इन्द्र अपनी विजय की खुशी में राज सिंहासन पर बैठा था इन्द्राणी के साथ,
देवता लोग अभिवादन करके ही बैठे थे | मनुष्य निगुरा हो, धन संपत्ति बढ़ जाये, एश्वर्य बढ़ जाये, विवेक न हो, तो
एश्वर्य का मद भी आता है – घमण्ड | इन्द्र अपने वैभव-एश्वर्य से छककर बैठे थे इन्द्राणी के साथ इन्द्रासन पर |
गुरु बृहस्पति आये, अब शास्त्र में तो ये बात आती है के जब गुरुदेव आते है तो उठ खड़ा होना चाहिए, चाहे
सप्तदीप पृथ्वी का राजा हो, चाहे बडा धनाडिया हो, चाहे बडा सत्ताधीश हो | गुरु बृहस्पति समझ गए की मद्धो
उन्मत्त हुआ है | गुरु बृहस्पति चले गए वहाँ से | इन्द्र को बाद में पता चला के अरे – गलती हो गयी | असुरों को
पता चला और वो असुर गए गुरु शुक्राचार्य के पास के इन्द्र के गुरु इन्द्र से रूठे है, अब कोई युक्ति बताओ तो हम
शत्रु को आराम से जीतेंगे | गुरु ने कहा बिलकुल पक्की बात है | जिसका गुरु ने मुख मोड लिया है, गुरु जिसका
रूठा है वो तो मच्छर है, चाहे बडा आसन पर बैठा है तो क्या है; तुम विजयी हो जाओगे | इन्द्र को पता चला शत्रुओं
ने आपस में मेलजोल कर लिया है; अब गुरु हमारे रूठे है, गुरु को मनाने के लिए इन्द्र गया | वक्त पर जो काम
होता है न वो बड़ा आसानी से होता है और बेवक्त से काम बडा तकलीफ से होता भी है, नहीं भी होता है | गुरु आये
उस वक्त उठ खडे होते वक्त से उनका आदर सत्कार करके दुआ ले लेते तो आसान था | गुरु रूठ गए अब शत्रुओं
ने धावा बोला है अब बेटा जा रहा है गुरु के द्वार | गुरु घर से चल दिए गुरु पत्नी ने कहा की गुरुदेव नहीं है | गुरु
को पता चला आ रहा है वो पीछे के दरवाजे से रवाना हो गये | गुरु के द्वार से जो ठुकराया गया उसको ठोकर ही
ठोकर खाना है |
इन्द्र पर दैत्यों ने धावा बोल दिया और बुरी तरह इन्द्र हार गए | देवता दर दर के ठोकर खाने लगे आखिर इन्द्रदेव
ब्रह्माजी के पास गए | ब्रह्माजी ने कहा के इन्द्र जब तक गुरु की कृपा तुम साथ नहीं ले चलोगे तब तक तुम्हारा
विजयी होना जरा कठिन है | उम्र में भले कम हैं लेकिन हैं गुरु पद में आसीन | त्वष्टा प्रजापति के पुत्र विश्वरुपा –
ये भागवत में कथा आती है | जाओ उनकी शरण लो देवता लोग और इन्द्र उनको रिझाओ |
त्वष्टा प्रजापति के पुत्र विश्वरुपा के पास इन्द्र और देवता लोक आये है प्रार्थना किया है – के वैसे तो हम तुम्हारे पितृ
होते है लेकिन अभी इस समय हम आपके शिष्य होने को आये है और अपने कार्य सिद्धि के लिए उम्र से बडा
आदमी छोटे उम्र वाले का सत्कार करें तो कोई आपत्ति नहीं | हम पितृ है, आयुष में तो तुम से बड़े है लेकिन हमें
अपना कार्य साधना है, हम आपकी मदद लेने आये है आपकी शरण आये है | विश्वरुपा ने कहा ऐसा न कहो, वैसे ही
आप हमारे पितृ लोग है | (दो प्रकार के देवता होते है, एक आजानु देवता एक करमज देवता | जो सत्कर्म, यज्ञ-याग,
तप, व्रत करके देवता बने है उन्हें करमज देवता कहते है | और जो सृष्टी के आदि से ही देवता है और सृष्टी के अंत
तक देवता रहते है उन्हें आजानु देवता कहते है | तो ये करमज देवता हजारों वर्ष पहले जप तप किया था और देवता
बने है त्वष्टा प्रजापति के पूर्वज तो है उसमे |)
त्वष्टा प्रजापति के पुत्र विश्वरुपा का आदर सत्कार करते हुए प्रार्थना की गयी | उन्होंने कहा ऐसे तो पुरोहित पद
निंदनीय है, पुरोहित पद कोई अच्छा नहीं | योग वशिष्ठ में वशिष्ठ महाराज भी बोलते है की पुरोहित पद अच्छा नहीं
है लेकिन रामजी जिस कुल में जन्म लेने वाले है तो उस साकार ब्रह्म का सानिध्य मिलेगा | उनका पुरोहित बनूँगा
इसलिए मैंने पुरोहित पद स्वीकार किया है | आचार्य ब्रह्मा का मूर्ति है, पिता प्रजापति है, माता पृथ्वी की मूर्ति है,
भ्राता इन्द्र है और बहन साक्षात् दया का स्वरूप है और ये आत्मा सब धर्मों का मूल है | अभ्यागत अग्नि का स्वरूप
है, अतिथि के रूप में साक्षात् भगवान आये ऐसा भारतीय संस्कृति का मानना है और ऐसा मानने से पुण्य होता है
लाभ होता है |
इन्द्र देव ने प्रार्थना की तो विश्वरुपा कहते है की मैं तुम्हारा पुरोहित पद स्वीकार कर लेता हूँ | पुरोहित पद स्वीकार
करके उन्होंने देवताओं को सफल होने के लिए नारायणी विद्या बताई | जिस नारायणी विद्या के बल से देवताओं का
विजय हुआ और ऐशवर्य सम्पन्न हुए | नारायणी विद्या के बल से शोक रहित हुए | नारायणी विद्या के बल से चिंता
मुक्त हुए | नारायणी विद्या के बल से तनाव मुक्त हुए | निर्धनता मुक्त हुए और ऐशवर्य सुख सम्पदा और आनंद
को प्राप्त हुए | शुकदेवजी ने वर्णन किया, परीक्षित कहते हैं के वो नारायणी विद्या क्या होती है महाराज ? तब कृपालु
शुकदेवजी ने कहा नारायणी विद्या अपने अंगो में स्नान आदि करके पवित्र हो जाना चाहिए | मैं अभी नहा कर
आया, सुबह नहाया था, अभी नहा कर आया | लोग कपड़े तो चमकीले रखते है लेकिन शरीर गन्दा रखते हैं – अच्छा
नहीं होता | शरीर भी पवित्र हो और वस्त्र भी शुद्ध हो | चमकीले कपड़े नहीं लेकिन शुद्ध कपड़े हो, स्वच्छ कपड़े हो |
एक बार बाथरूम में जाये तो हाथ पैर धोना चाहिए, कुल्ला करना चाहिए - शरीर और मन शुद्ध रहता है | लेट्रिन
में कपड़े पहन के जाये तो वही कपड़े फिर अशुद्ध माने जाते है | वे कपड़े साबुन देकर नहीं तो ऐसे ही पानी में डुबो
कर सुखा कर फिर पहनने चाहिए |
शरीर के शुद्धि के साथ साथ मन की शुद्धि का संबंध है, अर्थात तन मन से शुद्ध हो कर स्नान-आदि और स्वच्छ
वस्त्र पहन कर बैठना ये तन से शुद्धि है और मन से किसी का बूरा न सोचना और भगवान मेरे है और मैं भगवान
का हूँ ऐसा पक्का भाव करके बैठना ये मन की शुद्धि है | तो तन मन से शुद्ध हो कर नारायणी विद्या का,
नारायणी शक्ति का आवाहन करना चाहिए इसे नारायण कवच भी बोलते है | शुकदेव जी महाराज कहते है की हे
राजन परीक्षित, त्वष्टा प्रजापति के पुत्र विश्वरूपा ने नारायणी विद्या बताया, उस नारायणी विद्या से देवता देदीप्यमान
हुए | कैसी नारायणी विद्या ? के नहा धो कर स्वच्छ-पवित्र हो कर तन-मन से | उत्तर के तरफ अथवा पूर्व अभिमुख
अपने शुद्ध आसन पर बैठ कर, दरब आदि ऊँगली में बांध कर, अपने शरीर दाये-बाये, आगे और पीछे शिखा पर,
नेत्रों पर आदि पानी के छिटकाव लगाये, “ॐ नमो नारायणाय, ॐ नमो नारायणाय” करके अथवा “ॐ नमो भगवते
वासुदेवाय” अथवा “नमो नारायणाय, नमो नारायणाय” इस प्रकार आवाहन करे अपने तन में, मन में उस नारायण
शक्ति का | ऐसा नारायण कवच पहन कर जो आदमी पुण्य कर्म करता है उसके पुण्य कर्म उसको अमिट फल देते
है |
नारायण स्मरण करके अपने छुपे हुए नारायण तत्व को जगा कर कोई सत्संग-कीर्तन भजन करता है तो उसे विशेष
लाभ होता है | आज के जमाने में नारायण कवच की बहुत जरुरत है, हवामान में तनाव खूब है, वातावरण में
सेक्सुअल काम बिकार खूब है, लोभ खूब है, चिंता और एक दुसरे की criticize (निंदा) हवामान में बहुत है | जैसे
योद्धा युद्ध करने जाता है तो साथ में अस्त्र शस्त्र रखता है लेकिन कवच भी पहनता है | ऐसे हम लोग संसार में
युद्ध के मैदान में जाएँ, अपने बचाओ के लिए, निभाओ के लिए, आजिविका के लिए पुरुषार्थ रूपी अस्त्र-शस्त्र तो
रखे | लेकिन वो बचाओ या विजय के साथ साथ कहीं शत्रु का छुरा न घुस जाए इसलिए हमे भी अपना कवच धारण
करना चाहिए |
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जिनके जीवन में ये आध्यात्मिक कवच धारण करने की कला है उनके ऊपर दुर्जनों का, दुष्टों का, तुच्छ संकल्पों का
प्रभाव नहीं पड़ता है | राजनेता है तो आस पास उसे कई ‘स्टेन गन’ वाले चाहिए, कई सुरक्षा जांच वाले चाहिए, फिर भी
राजनेता बेचारे धड़ाक-भड़ाक हो कर मर जाते है – ये आपने हमने सुना है | राज नेताओं से भी ज्यादा महापुरुषों
का यश होता है फिर भी महापुरुषों के इर्द-गिर्द स्टेन गन नहीं होती है, नारायण कवच का आलौकिक प्रभाव है |
नारायण ..., नारायण..., नारायण |
ये तो हुई बाहर की बात दूसरी भीतर की बात है के हमारे मन को कभी क्रोध रूपी शत्रु घेरता है तो कभी काम रूपी
शत्रु सताता है तो कभी लोभ सताता है तो कभी मोह सताता है | इन्द्र आसन पर बैठने के बाद भी मद ने सताया है,
देवताओं के स्वामी को भी जब ये विकार परेशान कर सकते है तो आज कल के मनुष्यों की तो बात ही क्या ?
इसीलिए साधकों को चाहिए की सुबह–दोपहर–शाम संध्या करें अथवा तो नारायण कवच धारण करें | रात्रि के श्वास ओ
श्वास में जो वात-पित्त- कफ से जो नाड़ियों में पाप-ताप आ जाते है सुबह के प्राणायाम से रात्रि का पाप ख़त्म होता हैं
दोपहर को प्राणायाम करते तो सुबह से दोपहर तक के टाइम में जो कुछ हुआ रजों-तमो गुण वो प्राणायाम और
संध्या से नष्ट होता है | फिर शाम की संध्या करते तो दोपहर के १२ से शाम क ७ बजे तक के जो कुछ “कुछ दोष”
शरीर में, मन में आया वो नष्ट होते | त्रिकाल संध्या माना घर में तीन टाइम बुहारी – ह्रदय रूपी घर में तीन टाइम
बुहारी | बहुत फायदा होता है |
जो द्विजातिय तीन टाइम संध्या करते है उसे रोजी रोटी की चिंता नहीं होती | जो द्विजातिय त्रिकाल संध्या करते है
उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती | उसके बेटे उसके शत्रु नहीं बनते नहीं तो आज काल के साहाबों के बेटे, साहबों के
मेम साहब के बेटे मेम साहब के शत्रु हो जाते है | देखो कौशल्या माता नित्य शुभ कर्म करती थी – रामचन्द्र जी
कितने उनके सुपात्र पुत्र हैं | भरत भी कैसे हैं, लक्ष्मण भी कम नहीं और शत्रुघ्न भी कम नहीं | एक से एक हैं |
जो सत्कर्म करता है और नारायण कवच पहनता है उसके कुल में दुष्ट आत्मा नहीं आती | माँ बाप को दुःख देने
वाले सताने वाले पुत्र नहीं आते | जो नारायण कवच धारण करता है उसके ह्रदय में दुष्ट भाव ज्यादा देर नहीं ठहर
सकते | जो नारायण कवच पहनता है उसकी अकाल मृत्यु नहीं होती और जो नारायण कवच पहनता है अकारण
उसका मन उद्विग्न नहीं होता | जो नारायण कवच पहनता है अथवा ब्रह्मज्ञानी महापुरुष है, ब्रह्मज्ञान का कवच जिसने
सदा के लिए धारण कर रखा है उसकी दृष्टि जितने लोगों पर पड़ती है उतने लोग भी पवित्र होने लगते है इतना
उसका प्रभाव है |
नानक जी ने ठीक कहा है – ब्रह्मज्ञानी की दृष्टि अमृत वर्षी, ब्रह्मज्ञानी अनाथों का नाथ, ब्रह्मज्ञानी का सब ऊपर
हाथ, ब्रह्मज्ञानी की मत कौन बखाने, नानक ब्रह्मज्ञानी की गत ब्रह्मज्ञानी जानें | नारायण कवच या तो ब्रह्मज्ञान का
कवच जिसने अपने गुरु से ब्रह्मज्ञान का कवच पा लिया है उसकी तो महिमा अपरम्पार है, उसको तो बार बार
नमस्कार है | मत करो वर्णन हर बेअंत है, साध जना मिल हर जश (यश) गाये | साधु पुरुष के साथ मिलकर हरि का
जश (यश) गाओ | हरि का जश तो ऐसे भी गाये, ऐसे भी गायेंगे, तो गाने वाला मैं हु और मैं हरि का जश गा रहा
हु – हरि कही हैं, आएंगे | अथवा तो थोडा गायेंगे तो अहंकार आ जायेगा अथवा तो विषाद आ जायेगा |
नहीं गाते है उनके अपेक्षा गाने वालों को धन्यवाद है लेकिन तो “साध जना मिल हर जश गाते” उनका तो बेडा पार
हो जाता है उनको प्रणाम है | क्योंकी वो जो साध पुरुष है, संत पुरुष है उनके सानिध्य में बैठ कर हरि चर्चा, हरि
कीर्तन, हरि ज्ञान, उसका महातम भारी हो जाता है | जैसे कोई युवान लड़का है IAS ऑफिसर बना है उसने IAS
ऑफिसर बनने के लिए एग्जाम (परीक्षा) दे दिया है लेकिन उसकी पोस्टिंग अभी नहीं हुई | वो आपके घर के पास
भी रहता है, कलेक्टर होने के काबिल है, कलेक्टर हो जायेगा लेकिन अभी तक पोस्टिंग नहीं हुई तो उसके सिग्नेचर
की कोई कीमत नहीं है | अगर एक बार कलेक्टर हो गया है और उसी इलाके का जहाँ आप रहते है तब उसकी
सिग्नेचर का बोल बाला है | आर्डर बड़े साहब का आर्डर | नरशिमा राव प्राइम मिनिस्टर नहीं हुए थे तब उनके
सिग्नेचर की कीमत इतनी नहीं थी जितनी अभी हो गयी |
तो एक लौकिक व्यवहार में भी आदमी पदवी पे बैठता है तो उसके sign (हस्ताक्षर) की कीमत हो जाती है | ऐसे
जिसने नारायण कवच पहन लिया है अथवा ब्रह्मज्ञान कवच पहन लिया वो महापुरुष भगवान की बनाई हुई पदवी पे
बैठा है | उनके सानिध्य में जो काम होता है तो उनकी निगाह रूपी सिग्नेचर मिल जाती है तो हमारा सत्कर्म
sanction हो जाता है | पुण्य हमारा पास हो जाता है, स्वीकार हो जाता है | कागज तो बहुत सारे है, ठप्पे भी
बहुत सारे है लेकिन जिन कागज और ठप्पों के साथ राष्ट्रपति, प्राइम मिनिस्टर अथवा कलेक्टर की जिस किसी की
सइ हो उसकी अपनी कीमत बन जाती है | ऐसे भजन गाने वाले तो बहुत है लेकिन जिनके दिल पर गुरु की निगाह
पड गई उनकी कीमत कुछ और हो जाती है |
औखी घड़ी न देखन देवइ सतगुरु अपना बिरध संभाले | औखी घड़ी | जिन्दगी भर जिन रुपयों–पैसों को, रिश्ते नातो
को संभाला है वो सारे के सारे मृत्यु के समय छोड़ कर जाना पड़ेगा | फिर प्रकृति किस देह में डाल दे कोई पता नहीं
है – ये औखी घड़ी है | जेल जाना कोई औखी घड़ी नहीं है, अस्पाताल जाना कोई बड़ी औखी घड़ी नहीं है, लेकिन
सारे जीवन और सबंधों को छोड़ कर मौत में जाना बड़ी औखी घड़ी है | ऐसी औखी घड़ी पर नारायण कवच अथवा
ब्रह्मज्ञान का कवच पहने हुए महापुरुषों की सिग्नेचर ही काम देती है बाकि की किसी की कीमत नहीं | साध जना
मिल हर जश गाइए, संतों के साथ मिलकर हरि का जश गाइए | तुलसीदास महाराज को पत्नी ने डाट दिया | अँधेरी
रात में - मैं मायके आई हूँ और तुम अँधेरी रात में मेरे घर पहुच गए हो | कैसे पहुचे ? बोले खिड़की खुली थी,
रस्सी बाँधी थी तूने – बोले मैंने तो रस्सी नहीं बाँधी | लालटेन की बाट ऊँची करके देखी तो ओ बरसात के दिनों में
सर्प – अजगर लटका था उसको रस्सी समझ कर कूदा बंदा | पत्नी ने कहा मेरे से – मेरे हाड़ मांस के शरीर से
मिलने के लिए तुम्हें इतनी धून चढ़ी के साप है की रस्सी है पता नहीं चला और कूद के आ गए | हाड़-मांस की देह
मम ता में इतनी प्रीती, याते आधी जो राम प्रति तो अबस मिटे भव बीती – इससे आधी जो भगवान के प्रति प्रीती
होती जितना मेरे इस हड्डी के इस शरीर से तुम्हारी स्नेह है, प्रीती है उससे आधी भी अगर ईश्वर से होती तो
तुम्हारा भव बीती – जन्म मरण का दुःख मिट जाता | तुलसीदास बोलते है फिर से बोलो, पत्नी ने कहा “हाड़ मांस
की देह मम...” दो सीधे हड्डे है और बाकी के आडे हड्डे है, बीच में माउस है, बीच में रग है माउस को बाँधने के
लिए नस नाड़िया है बीच में खाली जगह है, वहाँ मल-मूत्र-विष्ठा है | नाक में खाली जगह है वहाँ लिट् है बाल है,
शरीर में रखा भी क्या है | इस शरीर में इतनी मोहब्बत, ऐसा हड्डी-मांस- मल-मूत्र-विष्ठा-थूक-लिट् गंदगी का थैला,
फिर भी प्यारा लग रहा है तो उस रब की हाजरी है, उस परमात्मा की चेतना है उस नारायण की नारायणी शक्ति
है | मेरे शरीर में इतना तुम्हें मोह है लेकिन शरीर जिससे ताजा तवाना और सुन्दर दिख रहा है वो परमात्मा
कितना सुन्दर होगा | वो रब कितना आनंद स्वरुप होगा | इस मेरे हड्डियों में तुम्हे आनंद दिख रहा है | अगर मैं
मर जाऊँ तो हड्डियाँ तुम्हें आनंद नहीं देगी | मैं बीमार पड जाऊँ लाचारी हालत में हो जाऊँ तो तुम पति होते हुए भी
पराये हो जाओगे लेकिन मेरा परमात्मा कभी पराया नहीं होता है, वो तुम्हारा भी है मेरा भी है | तुम उसी में प्रीती
करो | तुलसीदास ने हाथ जोड़े के आज से तू मेरी पत्नी नहीं तू मेरी गुरुदेव है, जो संसार से वैराग्य करा दे, काम
विकार से वैराग्य करा दे, लोभ मोह से वैराग्य करा दे वो तो परम हितेषी है लेकिन जो काम विकार में गिराएँ क्रोध
लोभ में गिराएँ वो मित्र नहीं बड़ा बैरी है |
तुलसीदास को पत्नी ने वैराग्य का उपदेश दिया तुलसीदास जंगल में गएँ | हे भगवान मैं कामी हु कुटिल हु खल हु,
मैं संत तो नहीं बन सकता लेकिन संत के द्वार का तू मुझे दास बना देना सेवक बना देना | फिर सोचते की सेवक
बनने के लिए भी तो पुण्य चाहिए, मैं संत का सेवक नहीं बन सकता हु तो कम से कम संत के द्वार की गौ बना
देना ताकि मेरा दूध उनकी सेवा में आ जाएँ देर सवेर मेरा कल्याण हो | फिर सोचते है की संत के घर की गाय
बनना ये कोई मजाक की बात है कोई पुण्य आत्मा जिव होगा तब संत के द्वार गाय बन कर आएगा | मैं तो पापी
कामी कुटिल | साप को रस्सी समझ कर पत्नी के हाड़ मॉस चाटने वाला बुद्धू सिंह | मैं कैसे बन सकता हु संत के
द्वार की गाय | हे भगवान और नहीं तो संत साधु भक्त के घर का तू मुझे घोड़ा ही बना देना, भक्त कथा सुनने या
कथा करने जायेगा मेरी पीठ पर बैठेगा, मेरी सेवा हो जाएगी | फिर सोचते की संत के द्वार का घोड़ा बनना ये भी
कोई साधारण बात नहीं है | भगवान मैं कामी कुटिल अधम, मैं घोड़ा न बन सकू तो कोई बात नहीं, कम से कम हे
मेरे रब हे मेरे नारायण तू मुझे संत के द्वार का कुत्ता ही बना देना | संत की निगाह पड़ेगी देर सवेर कुत्ता का शरीर
पूरा होगा तो तेरे द्वार तक तो पहुचुंगा | उनकी निगाहे तो पड़ेगी | भगवान कुत्ता क्यों बनाएं, घोड़ा क्यों बनाये गाय
क्यों बनाये भगवान ने तो तुलसी को संत तुलसीदास बनाकर जगत को दिखा दिया |
मैंने अगली बार अर्ज किया था की श्रीमद्भाग्वद में कथा आई के ऋषभदेव के पुत्र भरत जिनके नाम से ये भारत देश,
पहले इस देश का नाम था अजनाबखंड | भरत राजा इतने पराक्रमी थे की उनके नाम से इस देश का नाम भारत पड़ा
है और उन्होंने देखा की मैंने इतना सवारा सुधारा लोगों को सुख सुविधायें दी और लोग तो रचे पचे रहे | मेरी
जिन्दगी तो युही ख़त्म हो जाएगी | लोगों की सेवा कर दी अब अपनी सेवा करू मैं | अपनी सेवा करने के लिए वो
बुद्धिमान राजा साधु बन गए | गंदगी नदी के किनारे झोपड़ी बनाकर रहने लगे, पूरा भारत देश दे दिया व्यवस्था
करने को | मर कर छोड़ना, जीते जी छोड़ दिया |
शास्त्र का रंग कब लगा ? सत्संग का और शास्त्र का रंग लगा हो तो ये कैसे जाने ? उसका माप दंड क्या है ? की
जो जो संसार से वैराग्य आये तो समझना के सत्संग का रंग लगा है, शास्त्र का रंग लगा है | सत्कर्म करने से
वैराग्य आना चाहिए | संसार की आसक्ति से | जो सत्कर्म है तो वैराग्य बढ़ेगा | अगर कुकर्म है तो राग बढ़ेगा | राग
दुःख का कारण है और वैराग्य सुख का कारण है परमात्मा प्राप्ति का कारण है |
वो राजा भरत सम्राट झोपड़ी बांधकर अपना जीवन यापन करता है, कंद मूल खाता है भगवान का (नाम) जप करता
है | ध्यान करता है | स्नान करते समय सूर्य को अर्घ्य देता है | ॐ सूर्याय नम:, आरोग्य प्रदाकाय नम:.. आदि
आदि | जिससे शरीर स्वस्थ रहता है और बुद्धि में शक्ति बढ़ती है | आप जिस देवता की जैसी उपासना करते उसी
प्रकार के गुण आपके अन्दर आते है, जैसे धरती में जैसा बीज डालते ऐसा ही फल-फूल वृक्ष आदि आता है | ऐसे ही
जैसे आप जप-ध्यान करते है ऐसे ही आपकी योग्यतायें बढ़ती है |
इतवार को सूर्य की विशेष उपासना करने से वुद्धि शक्ति का विकाश होता है, सोमवार को शिव की उपासना करो
शिव तत्व जाग्रत होता है | मंगलवार को मंगल मूर्ति हनुमानजी का ध्यान करने से बल बढ़ता है | और बुधवार को
देवी की उपासना से देवत्व बढ़ता है | गुरुवार गुरुदेव का वार है | नास्ति तत्वं गुरु परम | गुरुवार को गुरुदेव का
ध्यान भजन उपासना करने से गुरु तत्व जगता है और जीवन में बरकत आती है | शुक्रवार को आदि शक्ति की
उपासना और शनिवार को फिर हनुमंत, रविवार को फिर सुर्यदेव | ऐसे तो सब दिन सब देवो की पूजा होती है लेकिन
देवो का अपना अपना दिन विशेष करके लाभ देता है |
ऐसे ही यात्रा में रघुवीर का सुमिरन करने से यात्रा निर्विघ्न समाप्त होती है | आरोग्यता के लिए अश्विनी कुमार का
स्मरण करना चाहिए और दुष्चरित्र से बचने के लिए भगवान दत्तात्रये का स्मरण करना चाहिए | और ह्रदय में सुख
शांति और आनंद का प्रागट्य हो इसलिए भगवान और गुरु मंत्र और गुरुदेव का चिंतन करने से ह्रदय आनंदित होता
है | अहेतु की और सुपर कृपा गुरुदेव करते है |
कुछ लोग ऐसे ऐसे मिलते है तो मुझे हंसी आती है | कुछ आएंगे न बापू, बापू, ये हमारे फलने भाई है, इनको
एकदम बढ़िया आशीर्वाद दो | मैं क्या आशीर्वाद बढ़िया और घटिया | जय राम जी की | बापू आने आमने बहुत सारा
आशीर्वाद आपो | कोई ने सारा आशीर्वाद तो कोई ने खोटा आशीर्वाद गुरु ने ऐ शिक्वाये न थी | कभी कभी वो UP
जाते, तो MP जाते तो बापु इसको स्पेशल आशीर्वाद दो तो चालु और स्पेशल वो चाये होती हैं बादशाही चालू, आशीवार्द
चालू-स्पेशल क्या होंगे ! इन आदमी की अपनी हैबिट है (आदत है) जैसी लौकिक जगत में आदत है ऐसी फिर
अध्यात्मिक जगत में भी बात करें आता है, हम समझ जाते है, ठीक है बेचारा नया बंदा है | बापू मेरे को आशीर्वाद
चाहिए | कैसा आशीर्वाद चाहिए ? के बढ़िया से बढ़िया चाहिए | मैंने कहा कौन से नंबर का ! नारायण .... नारायण
.... नारायण | तो नारायण कवच धारण करने से बढ़िया से बढ़िया आशीर्वाद दिन भर रहता है |
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नारायण का सुमिरन और नारायण कवच का धारण मति की मंदता को दूर करता है | पाप-ताप बढ़ाने
वाले जो दुष्ट विचार हैं उनको दूर रखता है | जल ले लिया छिटक दिया अपने चारों तरफ | पहले जल
लिया, शुद्ध जल, पहले नहा-धोकर शुद्ध वस्त्र पहने | शुद्ध स्थान में बैठे, प्राणायाम आदि कर लिया,
भगवान-गुरुदेव का सुमिरन करके नारायण नाम का मानसिक जप करके जल में देखें | फिर चहू ओर
वो जल छिटके | इससे नारायण तत्व विकसित होता है |
जैसे धरती में मिट्टी में आपको शक्कर नहीं दिखती, गन्ना नहीं दिखेगा | मिट्टी में आपको गुड़ नहीं
दिखेगा | मिट्टी में आपको कपड़ा नहीं दिखेगा सूती, लेकिन ये सूती कपड़ा मिट्टी से आया है, मैं
बिलकुल सच बोलता हूँ | जय रामजी की | बच्चे को कह दो के ये मिट्टी में से आया है तो बोलेगा
झूठ बोलते हो, नहीं हो सकता | लेकिन जो समझता है इस साइंस को के कैसे मिट्टी से आया, काला
थ्या, रुई हुई, फिर ये हुआ, वो हुआ | तो जैसे मिट्टी से कपड़ा भी आता है, मिट्टी से शक्कर भी आती
है, मिट्टी से गुड़ भी निकलता है, मिट्टी से तेल भी निकलता है | बोले मिट्टी से तेल निकलता है तो
लो तेल निकाल के दिखाओ | तो नहीं निकलेगा | लेकिन बुद्धिमान जानते हैं के मूंगफली, एरंडा आदि
बुआई करो फिर तेल निकलता है |
ऐसे ही तुम्हारे दिल से विश्व नेता परमात्मा प्रकट हो सकता है | लेकिन कोई कहे के चीरो, पकड़ो,
फाड़ो, देखो तो परमात्मा नहीं दिखेगा, खून दिखेगा, हड्डियाँ दिखेंगी, नस-नाड़ियाँ दिखेंगी, मल-मूत्र
दिखेगा |
लेकिन साधन-भजन का प्रोसेस करो तो परमात्मा भी निकलेगा और जीवात्मा भी | और विश्व नेता
आनंद स्वरूप ब्रह्म का भी अंदर से प्राकट्य हो जायेगा |
जैसे धरती से इन आँखों से नहीं देख सकते फिर भी बुद्धि की आँखों से पता चलता है के धरती से
बहुत सारी चीजें निकलती हैं | हम लोगों का जीवन आधार धरती ही है और क्या है | धरती से ही
सारी चीजे आती हैं | ऐसे ही ये शरीर का जीवन आधार ये धरती है | धरती और तुम्हारा जीवन
आधार वो पर ब्रह्म परमात्मा है अकाल पुरुष | आद सत, जुगात सत, है भी सत, नानक होसी भी सत
| ये शरीर नहीं था, तभी भी वो था | शरीर है तभी है, और शरीर मर जायेगा तभी वो रहेगा | वो
अकाल है, शरीर तो काल का ग्रास होता है लेकिन परमात्मा अकाल है | उस अकाल पुरुष का जिसको
ज्ञान हुआ वो विलक्ष्ण महात्मा हो जाता है |
एक महात्मा ऐसे होते हैं, रामकृष्ण परमहंस दृष्टान्त दिया करते थे | नरेंद्र माना विवेकानंद को जब
आत्म साक्षात्कार हुआ है तो विवेकानंद ने कहा है अब क्या बोलना, कहाँ जाना ।
इस नारायण कवच को घर घर तक पहुंचने में आप अपना योगदान दे और पुण्य के भागी बने, आपके एक शेयर से किसी के जीवन मे खुशी आ सकती है।
सम्पर्क: नारायण कवक संस्थान
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प्रस्तुत है नारायण कवच:
नारायण कवच श्रीमद्भगवद में 36-46 के आठवें अध्याय ’श्लोक के छठे ach स्कन्ध’ में दिखाई देता है।
नारायण कवच को विश्वरूप ने भगवान इंद्र को पढ़ाया था।
नारायण कवच का शाब्दिक अर्थ है भगवान नारायण का कवच। एक कवच एक को मारपीट और विपत्तियों से बचाता है।
ठीक यही प्रार्थना करने के लिए है।
यह एक आकर्षक प्रार्थना है जैसा कि आप सीखेंगे यदि आप, कम से कम अनुवाद का अनुवाद करेंगे।
अनुवाद को पहले प्रस्तुत करना। मूल इस प्रकार है:
भगवान हरि आपको हर तरफ से सुरक्षित रखें।
श्री हरि ने अपना 'चरण कमल' (कमल के पैर) श्री गरुड़ (भगवान विष्णु का वाहन) की पीठ पर रखा है
सभी 8 'सिद्धियाँ' (चमत्कारी शक्तियाँ) उनकी सेवा करती हैं।
अपने 8 हाथों पर, वह 8 हथियार रखता है।
(शंख, चक्र, धवल, तलवर, गदा, बाण, धनुष और पाष)।
प्रभु मुझे पानी में सभी जल जीवों से मत्स्य-मुर्तिर (भगवान विष्णु का मत्स्य अवतार) के रूप में रक्षा करें।
प्रभु मुझे फफूंद के फफूंद से बचाएं। पृथ्वी पर, भगवान वामन (भगवान विष्णु के अवतार) मेरी रक्षा कर सकते हैं।
भगवान त्रिविक्रम आकाश में मेरी रक्षा करें।
भगवान नरसिंह (भगवान विष्णु का आधा मनुष्य और आधा सिंह अवतार) किसके द्वारा
शक्तिशाली गर्जन, सभी चार दिशाओं को हिला दिया, और गर्भवती महिलाओं ने अपने बच्चों को अपने गर्भ में खो दिया, मुझे किलों, जंगलों, जंगलों और खतरनाक स्थानों में सुरक्षित रखें।
वराह (भगवान विष्णु का वराह अवतार) जिन्होंने पृथ्वी की मदद से बचाया था
उनका तुस्क, और जो 'यज्ञ' (बलिदान, प्रयास) का प्रतीक है, जब मैं अपने रास्ते से जा रहा हूं तो मेरी रक्षा करें।
मई परशुराम (भगवान विष्णु के अवतार जिन्होंने सत्ता के भूखे भ्रष्ट योद्धाओं की धरती को साफ किया), पर्वत-शिखरों पर मेरी रक्षा करो।
मई श्री लक्ष्मण, श्री भरत के बड़े भाई श्री राम के साथ, जब भी मैं यात्रा करता हूं, मेरी रक्षा करें।
भगवान नारायण मुझे गलत विचारों, कर्मों से बचा सकते हैं (जब भी मैं 'धर्म', अपने कर्तव्यों के विरुद्ध कार्य कर सकता हूं)।
'ऋषि श्राता' मुझे मानव अहंकार से बचाती है।
भगवान दत्तात्रेय! कृपया उन बाधाओं से मेरी रक्षा करें, जो आम तौर पर तब होती है जब कोई प्रार्थना करने जाता है, या आध्यात्मिक सभाओं के लिए।
भगवान कपिल मुझे कर्मों के बंधन से बचाएं।
मई सनत कुमारा मुझे जुनून के भगवान से बचाएं।
मईया हर्षे, मेरी बात मानने के अपराध से बचो
देव मुर्टिस (मंदिर) कि रास्ते में एक का सामना होता है।
मई देव-ऋषि नारद मुझे ('सेवा-अपराध) मेरी सेवा में (दिव्य जीवों की) कमियों से बचाएं।
प्रभु का कछुआ अवतार मुझे सभी प्रकार की स्वास्थ्य समस्याओं से बचा सकता है।
भगवान धन्वंतरि मुझे अस्वास्थ्यकर खाद्य पदार्थों से बचाएं।
मई ऋषभदेव मुझे 'द्वंद्वों' (यानी आनन्द, दुःख, सुख, पीड़ा, जैसे, घृणा आदि) से बचाते हैं।
मई यज्ञ भगवान (यज्ञ या बलिदान के भगवान) मुझे सामाजिक कलंक से बचाते हैं।
भगवान शेष (सर्प) मुझे सभी प्रकार के सांपों से बचाएं।
मई वेद- व्यासजी मुझे अज्ञान से बचाते हैं।
भगवान बुद्ध मुझे पाखंड और आलस्य से बचाएं।
भगवान कल्कि कलियुग में प्रचलित सभी दुष्टों से मेरी रक्षा करें।
मई भगवान केशव ने अपने 'गदा' (अस्त्र) से मेरी रक्षा की।
भगवान गोविंद भोर के बाद अपनी बांसुरी से मेरी रक्षा करें।
दोपहर से पहले भगवान नारायण अपनी शक्ति से मेरी रक्षा कर सकते हैं।
दोपहर के समय, भगवान विष्णु अपने सुदर्शन चक्र (शस्त्र) से मेरी रक्षा कर सकते हैं।
दोपहर के दौरान, भगवान मधुसूदन अपनी पराक्रमी 'धनुष' (शस्त्र, धनुष) से मेरी रक्षा कर सकते हैं।
मई त्र-मूर्ति-धारी शाम के समय मेरी रक्षा करें।
सूर्यास्त के बाद भगवान ऋषिकेश मेरी रक्षा कर सकते हैं।
आधी रात को मैं भगवान पद्मनाभ से सुरक्षा चाहता हूं।
आधी रात के बाद श्री हरि मेरी रक्षा कर सकते हैं।
डॉन में भगवान जनार्दन हो सकते हैं, जो मेरी रक्षा करते हैं।
सूर्योदय से पहले श्री दामोदर मेरी रक्षा कर सकते हैं।
और भगवान विश्वेश्वर भी मेरी रक्षा कर सकते हैं।
हे सुदर्शन (प्रभु का हथियार) तुम एक रथ के पहिए की तरह दिखाई देते हो।
आपके किनारों को विनाशकारी आग की तरह तेज है।
अपने प्रभु के निर्देशों से, आप सभी पक्षों पर चलते हैं,
आग की तरह, हवा की मदद से, सूखी घास जलती है,
इसी प्रकार आप मेरे शत्रुओं (शत्रु) की सेना को नष्ट कर दें।
हे गदा! (हथियार) जो चिंगारियां आपसे निकलती हैं, वे स्पर्श के लिए असहनीय होती हैं।
आप भगवान अजीत (अजेय) के प्रिय हैं
इसलिए आप बुरी आत्माओं और साथ ही मेरे शत्रुओं (शत्रुता) को नष्ट करते हैं।
हे शंख! (शंख) मेरे शत्रु (और दुष्ट प्रवृत्ति) भयभीत हो जाते हैं, जब वे आपकी ध्वनि सुनते हैं जैसे भगवान कृष्ण आप पर बरसते हैं।
उनके दिल कांपते हैं और राक्षसों और बुरी आत्माओं को भागने का कारण बनाते हैं। हे पराक्रमी तलवार (तलवार) प्रभु की धार जिसकी तेज है।
तुम मेरे शत्रुओं का नाश करो (शत्रुता)
हे महाकाल, जो अगणित चंद्रमाओं से सुशोभित हैं,
आप मेरे पापी शत्रुओं (दुष्ट, शत्रु) की आँखों को हमेशा के लिए बंद कर दें।
उन सभी (जो) को नष्ट किया जा सकता है, जो (जो है) एक मेरी भलाई के लिए एक बाधा है।
मेरे जप और प्रार्थना के बल से मेरे सभी शत्रु (शत्रु) नष्ट हो जाएँ।
प्रभु का नाम, रूप, वाहन और सहायक हमारी बुद्धि, मन, श्वास और इंद्रियों की रक्षा कर सकते हैं।
ईश्वर वास्तव में 'एक्शन ’और in ऑल फॉर क्रिएशन’ है।
उपरोक्त सत्य की ताकत से, मेरी सभी बाधाएं समाप्त हो सकती हैं।
जिन्होंने 'ब्रह्म' को जान लिया है या आत्मज्ञानी हो गए हैं, उन्होंने महसूस किया है कि भगवान बिना रूप के हैं।
फिर भी प्रभु की 'माया' की शक्ति से यह सच है, कि प्रभु एक रूप धारण करते हैं, और ज्वेल्स, हथियार, गुण का मालिक (प्राप्त) हैं।
इसीलिए, ओमनी- वर्तमान भगवान श्री हरि हमेशा अपने स्वरूप के साथ मेरी रक्षा कर सकते हैं।
मई भगवान नरसिम्हा (भगवान विष्णु का अवतार, आधा शेर, आधा आदमी), जिसके पराक्रमी दहाड़ें, सभी के डर से भाग जाते हैं, और जिनके द्वारा (शत्रु की) चमक को भस्म कर दिया जाता है, मई वह हमेशा मेरी रक्षा करते हैं।
संस्कृत में निम्नलिखित मूल है:
ओम ह्रीं विदा-ध्यां मम सर्व रक्षाम्
न्यास्तांग्नि पद्म पित्गेन्द्र प्रियेते
दारि चारमासी गदेसु चापो
पाषाण द्धाहनोषता गुनोषता वाहु
जलेषु मम रक्षतु मत्सय मुर्तिर
यदो गणेभ्यो वरुणस्य पश्यत्
स्थलेशु मया वतु वमनो वयात्
त्रिविक्रमाहा खेवतु विश्र्वरूपा
दुर्गेशु एतवाजि मुखादिशु प्रभु
पयानं नृसिम्हो असुरायुस्तपारीह
विमुंचतो यस्य महात हासम
दिशो विदुरं नित्यंश्च गरभः
रक्षेत्स्वो महाद्वानि यज्ञकल्प
स्वदंशत्रेयो निनेत धावो वराहः
रामो अद्रिकतेषु अथ विप्रवसे
सा लक्ष्मणो अविद्या भरताग्रजो स्मन
मम नरा धरमद अहलिलात प्रमदत |
नारायणाय पातु नराश्च हसात्
दत्तास्तु अयोगत अथ योगनाथा
पय्यद गनेश कपिलाहा कर्मबन्धात्
सनत कुमरो अवतु का कामदेवाड
हया शीरशा मैम पथि देवहलनात
देवर्षिं भिन्नं शुद्धाश्च नानृतं
कोर्मो हरेर मम निरया द्वादश
धन्वंतरि भगवान पातु आपत्यद
द्वंद्वद भयाद ऋषभो निर्जितात्मा
यज्ञश्च लोका दवताद जनन्ताद
बालो गनत क्रोध वश दाहेन्द्र
द्वैपायनो भगवन् अपभोद्भव
बुधिस्तु पाखण्ड गनत प्रमादत
कल्किह कालि कलमालत प्रपटौ धर्मा-वनायो रुक्रतुता दत्त
मम केशवो गदाया प्रताता रवाड
गोविंद आसंगवा मात्र वीणु
नारायणं प्राह्नं यदुत्त शक्तिं मध्यम्
दीनी विष्णु रवींद्र पनिही
देवो अपराह्नहि मधुघौघं धन्व
स्याम त्रिदामा वतु माधवो मम
दोसे ऋषीकेश उतार्ध रात्रे
निशीथे एको अवतु पद्मनाभः
श्रीवत्स धाम परा-रत्रा ईशाह
प्रत्यूषा ईशो असिद्रो जनार्दनहा
दामोदरो अविद्या न संधिम प्रभाते
विश्वेश्वरो भगवन् कालमूर्ति
चक्रम् युगांतानल तिग्मणि
भ्रात समन्ताद भगवत प्रयुक्तम्
दण्डाग्ढे दण्डाग्ढ्यं अरिस्नाय माशु
ककशम यथा वता सखो हुताशाह
गडे सानी स्पार्शन विस्फुलिन्दे
निस्पिन्दि निस्पृहस्य अजिता प्रियासी
कूष्माण्डा वैनायका यक्ष रक्षो
भूत ग्रहाम् विद्वानो विद्वानो री
त्वाम ययातु धना प्रमथ प्रीता मातरु
पिसछा विप्र ग्रा घोरा द्रिशं
दरेंद्र विदरावया कृष्ण गरीबो
भीम संवरोरर रडायनि कमपयान
त्वम तिग्मधार शिवरात्रि सनाय
मीशा प्रयुक्तो मामा छिन्दी छी
चक्षूम शि चरमान छंद चन्द्र छांड़ाय
द्वादशम् अघोनां हरं पापं चक्षुषम्
यन्नो भयम् गृभ्यो भूत
केतुभ्यो नृभ्य इव च
सरेषु पेभ्यो दम्भ्थृभ्यो भूतभ्यो होभ्य इव वा
सर्वानि एतानि भगवान नाम रूपस्तत्र कीर्तनात
प्रयायन्तु संशयम् सद्यो नः श्रेया प्रतापका
गरुडो भगवन स्तोत्र स्तोभ रचंडो माया प्रभो
रक्षेत् शेशं कृच्छेभ्यो विस्वासेनहं स्वनामभिः
सर्व पदभ्यो हरेर नामा रूपा यनायौ धानी नः
बुधि इंद्रिय मन सराहन
पांतु पार्षद भूषनहा
यथा हि भगवनेव विशालुता सदासचायत
सत्येन नैना न सरवे यन्तु नशामुपाधरा वाः
यत् कथ्यं न्युभवानम् विकलपा रतिहा स्वयम्
भोष्णा युधि लिंगनाख्यं धात्यं शक्तये स्वयमाया
तेनैव सत्यमनेना सर्वग्यो भगवान हरह
पातु सर्वै सर्वोपायैना सदा सर्वत्र सर्वगः
विद्याक्षु दिक्षु उरध्वं माधौ समन्ताद
अन्तर बाहिर भगवाना नरसिम्हा
प्रफापायन लोका भवन संवेना
स्वतेजासा ग्रस्ता समस्ता तेजाः

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